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10वीं मुहर्रम (आशूरा) का दिन तारीख़े इंसानियत के ऐतबार से बहुत अहमियत रखता है,इसी दिन दुनियां बनीं और फ़ना भी इसी दिन होगी

पडरौना, कुशीनगर।

इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना मोहर्रम का महीना होता है जिसे ग़म का महीना कहते हैं। इसी मोहर्रम महीने की 10 तारीख को आशूरा का दिन कहते हैं। जिसमें पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन अपने 71 साथियों के साथ 3 दिन के भूखे प्यासे शहीद हुए थे।

जानिए 10वीं मुहर्रम की 10 बड़ी बातें।10 मुहर्रम शरीफ़ की बड़ी फजीलतें हैं आइये इसके ताल्लुक से चंद बातें गौर फरमाएं-

1.10वीं मुहर्रम शरीफ को हज़रत इमामे हुसैन रज़ियल्लाहु अन्ह शहीद हुए।

2.10वीं मुहर्रम शरीफ को हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम मछली के पेट से बाहर आए।

3.10वीं मुहर्रम शरीफ को हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की किश्ती किनारे पर लगी।

4.10वीं मुहर्रम शरीफ को हजरत याकूब अलैहिस्सलाम हज़रत युसूफ अलैहिस्सलाम से 40 साल बाद मिले।

5.10वीं मुहर्रम शरीफ को नबी हुजूर सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम का पहला निकाह हुआ।

6.10वीं मुहर्रम शरीफ़ को हजरत अय्यूब अलैहिस्सलाम को सेहत अता हुई।7.10वीं मुहर्रम शरीफ को नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम मक्का शरीफ से मदीना शरीफ हिज़रत की।

8.10वीं मुहर्रम शरीफ को हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम को तख्त अता हुआ।

09.10वीं मुहर्रम शरीफ को फ़िरऔन का लश्कर गर्क हुआ।

10.10वीं मुहर्रम शरीफ को हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के लिए आग गुलज़ार बन गई।

इंशानियत के बहुत अहम-अहम वाक्यात इसी मुबारक दिन को पेश आए। आज ही के दिन दुनियां बनी व आज ही के दिन दुनिया खत्म होगी। आज ही के दिन हजरते आदम अलैह इस्लाम दुनिया में तशरीफ लाए और आज ही के दिन हमारे नबी हजरत मुहम्मद मुस्तफा सल्ल अल्लाहो अलैहि वसल्लम के प्यारे नवासे हजरत इमामे हुसैन और इनके बहत्तर साथियों को कर्बला के मैदान में उन्हीं के मानने वालों ने निहायत बेदर्दी के साथ शहीद कर दिया और आप के घर वालो को कैदी बना दिया। जब भी मुहर्रम का महीना आता है तो यह दर्दनाक वाक्या हम सभी लोगों के दिलो दिमाग में घुम जाता है और हर खुश अकिदा मुसलमानों के आंखो से अश्क़(आँसू) निकल पड़ते हैं।बादशाह यजीद जो शरीयते इस्लामी में बदलाव लाना चाहता था। शराब और मदिरा जैसी घिनौनी चीज को पीता था और बहुत से ऐसे काम करता था जिसे शरीयत में हराम करार दिया है। इन सब बुराइयों के बावजुद वो इमामे हुसैन को अपना हमख्याल और अपना साथी बनाना चाहता था ।इमाम-ए-हुसैन ने उस गलत आदमी के सामने अपना सर न झुकाकर इस्लाम को बचा लिया और अपनी कुर्बानी पेश करके यें साबित कर दिया कि ” मर्दें हक बातिल के आगे मात खा सकते नही,सर कटा सकते है लेकिन सर झुका सकते नही।”दसवी मुहर्रम को इमामे हुसैन की शहादत को याद करते हुए उन्हे खेराजे अकीदत पेश करें एवं उनके व उनके साथियों के नाम से इशाले शबाब पेश करें। गरीबों और मिस्किनों का ख्याल करके उनकी मदद करें।

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